कर्म पहाड़ न टरे, टारेगा कोई संत!

रचनाकार ने इस सृष्टि की रचना इतने समुचित और सुनियोजित ढ़ंग से की है कि इसका हर पक्ष प्राकृतिक नियमों के अनुरूप ही कार्य करता है। आज के विज्ञान ने ऐसे बहुत से नियम और सिद्धांत उजागर किए हैं, जो प्रकृति की अनूठी छवि प्रस्तुत करते हैं। चाहे वह आण्विक स्तर (Atomic Level) पर पाउली अपवर्जन नियम (Pauli's Exclusion Principle) हो या हाइज़नबर्ग अनिश्चितता सिद्धांत (Heisenberg's Uncertainty Principle) हो! या फिर दृश्यमान भौतिक जगत में लागू न्यूटन के गति नियम ( Newton Laws of Motion),  उर्जा-संरक्षण का सिद्धांत (Law of Conservation of Energy) आदि हों! या फिर ब्रह्मांड में ग्रहों-उपग्रहों की गति से सम्बंधित केप्लर के ग्रहीय गति के नियम (Kepler's Laws of Planetary Motion) हों। ये सभी दर्शाते हैं कि सृष्टि का हर जड़ पदार्थ एक विशिष्ट नियम या सिद्धांत में बंधा है और उसी के अनुरूप गतिशील होता है।


यहाँ एक बात विचारणीय है। यदि प्रकृति ने जड़ व अचेतन पदार्थों पर अपनी नियमावली लागू की, तो क्या सृष्टि का सरताज कहे जाने वाले मानव को किसी नियम में नहीं बाँधा होगा? क्या रचनाकार इतना पक्षपाती हो सकता है कि वह मानव के लिए किसी अनुशासन की रेखा ही न खींचे? क्या प्रकृति ने मानव को उच्छृंखल ही विचरण करने का अधिकार दिया होगा? नहीं! भले ही आज के भौतिकी वैज्ञानिकों को ऐसे किसी सिद्धांत का ज्ञान न हो जो प्रकृति ने मानव पर लागू किया है; परन्तु भारत के आध्यात्मिक वैज्ञानिकों- हमारे ऋषियों व मनीषियों ने ऐसे सिद्धांत को खोजा और जनमानस को इससे अवगत करवाया-


            करम प्रधान बिस्व करि राखा।


         जो जस करई सो तस फलु चाखा।।


जी हाँ! 'कर्म सिद्धांत' (Universal Law of Karma)- यह है वह सिद्धांत, जिसे प्रकृति ने सार्वभौमिक रूप से हर देहधारी पर लागू किया है। जो जैसा कर्म करेगा, उसका फल उसे भोगना ही पड़ेगा।...

 

... पर कोई ऐसा यंत्र , कोई ऐसी तकनीक, कोई ऐसा शस्त्र अभी तक नहीं बन पाया है, जो इस 'कर्म सिद्धांत' को काट सके।...


...क्या है कोई इस सार्वभौमिक कर्म विधान का अपवाद? जानने के लिए पूर्णतः पढ़िए अक्टूबर 2018  माह  की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

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