पटाखों का क्या संबंध है दिवाली से?

दिवाली- खुशी, उल्लास, अनुष्ठान, मंगलगान, जगमगाहट, शुभकामनाओं, आशीषों...  का महापर्व है। पर पाठकों, विचारणीय है, क्या सच में दिवाली का त्यौहार वर्तमान में भी शुभ रह गया है? पटाखों के धमाके की गूँज कानों में दर्द, आतिशबाज़ी से फैला हुआ धुँआ आँखों में जलन और आँसुओं की सौगात दे जाता है। पटाखों के जलाने से फैला जानलेवा प्रदूषण साँस की कई परेशानियों को जन्म दे देता है। दमे से पीड़ित रोगियों के लिए तो दिवाली एक भयावह घटना है, जो हर साल उनकी रूह तक हिला जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 15 प्रदूषित शहरों में से 14 शहर भारत देश के हैं। इसमें पटाखों का योगदान जानने के लिए, पढ़िए इन तथ्यों को-

1. एक अध्ययन में पाया गया कि मात्र 20 मिनट की आतिशबाज़ी, एक लाख कारों से निकले धुँए के बराबर प्रदूषण करती है।

2. प्रतिवर्ष डेंगू से भी अधिक मौतें पटाखों के कारण होती देखी गई हैं।...

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पटाखों के जलाने से उत्पन्न हुई भारी पर्यावरण, सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधित समस्याएँ-

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5. क्या आपको लगता है कि अनार, चक्री और फुलझड़ी जलाने में कोई हर्ज नहीं है? यदि हाँ! तो इस तथ्य पर भी ज़रूर नज़र डालें कि ये पटाखे आवाज़ भले ही कम करते हों, पर बेहद खतरनाक धुँआ छोड़ते हैं।

पटाखों के भयावह प्रकोप से बचने के लिए सरकार ने गत वर्षों में कई कड़े नियम लागू किए। इनमें से एक कदम एन.सी.आर. में पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध था।... परंतु वर्षों से पटाखे जलाकर दिवाली मनाने वालों को बेहद ठेस पहुँची कि क्यों हम दीपावली पर्व का आनंद आतिशबाजी से नहीं ले सकते।

तब एक ज्वलंत प्रश्न उठा- 'क्या प्रभु श्रीराम के अयोध्या लौटने पर पटाखे जलाए गए थे? ... यह प्रकाशोत्सव निःसंदेह भारतीय ऋषि-मनीषियों की देन है। फिर इसके साथ यह शोरगुल और प्रदूषण से भरे, प्रकृति को नुकसान पहुँचाने वाले  बम-पटाखों को फोड़ने की परम्परा कैसे जुड़ गई? आखिर कैसे ये जानलेवा पटाखे दीपों से रोशन करने वाले पर्व का अभिन्न अंग बन गए? ... जिस महोत्सव में दीपदान करने की परम्परा थी, वह लोगों की ज़िंदगी लूटने वाला पर्व बन गया।आखिर कैसे इस शुभ पर्व की अस्मिता पटाखों से जुड़ गई? पूर्णतः जानने के लिए पढ़िए नवम्बर 2018 माह  की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

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