गुड़ या चीनी!

भारत वह देश है, जहाँ के वासियों को मीठा खूब भाता है। सर्दियों में, विशेषतः भोजन के बाद, मीठा खाने की प्रबल इच्छा होती है। पर मीठे से जुड़ी सेहत सम्बन्धी समस्याएं और बढ़ता वजन भी चिंता का सबब बनता जा रहा है। ऐसे में, स्वाद और सेहत दोनों के बेजोड़ संगम को बनाए रखने का हिट फार्मूला है- चीनी की जगह गुड़ से बने खाद्य पदार्थों का सेवन।
गुड़ हर प्रकार से चीनी से अधिक फायदेमंद होता है। भारतीय परम्परा में तो शुरुआत से रोटी के साथ गुड़ खाया जाता रहा है। आज भी पारम्परिक रेस्तरां में भोजन के बाद गुड़ व सौंफ परोसने का प्रचलन है। गाय को गुड़-चना खिलाना अच्छा माना जाता है। सर्दियों में गुड़ व मूँगफली से बनी पट्टी, गज्जक, रेवड़ी आदि बेहद फायदेमंद होती है। इसलिए चीनी नहीं, गुड़ ही भारतीयों की पहली पसंद थी और अब भी होनी चाहिए।


परंतु आंकड़ों के अनुसार गत पचास वर्षों में चीनी के सेवन में तीन गुणा वृद्धि देखी गई है।

आखिर चीनी ने गुड़ का स्थान कब और कैसे ले लिया?


गुड़ और चीनी दोनों एक ही वस्तु से बनते है- गन्ना! भारत में गन्ने का प्रयोग गुड़ बनाने के लिए किया जाता था। पर अंग्रेज़ चीनी के शौकीन थे। जब भारत उनका गुलाम हुआ, तो अंग्रेज़ चीनी की आपूर्ति भारत से करना चाहते थे। उन्होंने चीनी बनाने के लिए भारत में बहुत सी फैक्टरियाँ लगाईं। पर गुड़ निर्माताओं के पास सारा गन्ना चला जाने के कारण चीनी की फैक्टरियों को गन्ना नहीं मिल पाता था। ऐसे में, अंग्रेजों ने गुड़ बनाने पर रोक लगा दी और इसे गैर-कानूनी घोषित कर दिया।


पर अफसोस! आज आज़ादी के 70 सालों के बाद भी हम जाने-अनजाने उन्हीं की दासता को स्वीकार किए हुए हैं। गुड़ के बजाय चीनी का सेवन कर अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। नहीं समझ पा रहें कि चीनी हमारे पूर्वजों की देन नहीं, बल्कि अंग्रेजों की भारत को विषैली देन है।


... गुड़ और चीनी के बीच क्या है तुलनात्मक अध्ययन? 


... कौन सा गुड़ खाने में उपयुक्त है?


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