तीन बंदर!

आज हर ओर हिंसा का बोल-बाला है। जिस ओर भी नज़र जाती है, वहीं वैमनस्य भरा नज़ारा दिखाई देता है। बस में सफर करते लोग छोटी-छोटी बातों पर झगड़ पड़ते हैं। अपशब्द बोलना तो क्या, एक दूसरे को मारने-पीटने तक को उतारु हो जाते हैं। सड़क पर अनजाने में ही वाहनों की हल्की सी टक्कर हो जाये, तो भारी-भरकम बवाल हो जाता है। चालक हाथापाई पर उतर आते हैं। वहीं मीडिया की ओर नज़र घुमाई जाए, तो वर्तमान की अधिकतर फिल्मों में नकारात्मकता, क्रूरता, हिंसा, व्यभिचार ही प्रदर्शित किया जाता है। यहाँ तक कि बच्चों के कार्यक्रमों में से भी मासूमियत, बचपना, नैतिक शिक्षा आदि लुप्त हो चुके हैं। इनमें भी लड़ाई-झगड़े व विकार प्रस्तुत किए जाते हैं। केवल यहीं नहीं, थकान व तनाव दूर करने वाला, शांति व आनंद देने वाला संगीत भी अपनी गरिमा खो चुका है। फिर चाहे वे सुर या धुन हो या गाने के शब्द, सभी में क्रूरता, हिंसा, प्रचंडता, अश्लीलता का ही दर्शन होता है। संगीत 'मधुर' न रहकर शोर बन चुका है। समाज में बढ़ती इस उग्रता और नकारात्मकता की झलक अखबारों की सुर्खियों में स्पष्टतः देखने को मिलती है। जैसे-आतंकी हमले में कई लोग मारे गए; दोस्त ने दोस्त की हत्या कर दी; बच्चों के साथ दुष्कर्म हुआ... इत्यादि।

समाज की ऐसी दुर्दशा को व्यक्त करते हुए महान मनीषी कहते हैं-

कैसी है ये उन्नति, ये कैसी खोजबीन है,

जिसको देखो अपनी स्वार्थसिद्धि में ही लीन है।

आज के समाज का क्या बस यही विकास है,

कि आदमी को आदमी के रक्त की ही प्यास है!

अहिंसा, दया, क्षमा ये सब बिखर गए कहाँ?

सभ्यता के सारे मूल्य जाकर मर गए कहाँ?

 

अतः ये सभी तथ्य सिद्ध करते हैं कि समाज से 'अहिंसा परमो धर्म:' की उक्ति लुप्त हो चुकी है। हर ओर केवल पापाचार और हिंसा का ही पसारा है।

ऐसे घोर परिदृश्य में एक प्रतीक बड़े मार्के का है। वह है-तीन बंदरों की प्रतिमा। तीन बंदर पढ़ते ही आपके भीतर एक स्वर अवश्य कौंधा होगा- वहीं गांधी जी के तीन बंदर। पर यहां हम आपकी जानकारी को दुरुस्त करना चाहेंगे। ...

दरअसल इन तीन बंदरों का अस्तित्व सबसे पहले जापान में दिखाई दिया। 17वीं सदी में जापान के निक्को शहर में स्थित एक प्रसिद्ध टोशोगु मंदिर के दरवाज़े पर नक्काशी के रूप में पाया गया। ... जापान में तीन बंदरों को मुख्यतः इस प्रकार पुकारा जाता है।

 

मिज़ारू-आंखों को हाथों से ढके हुए- बुरा न देखने का प्रतीक!

किकाज़ारू-कानों को हाथों से ढके हुए- बुरा न सुनने का प्रतीक!

इवाज़ारू-मुँह को हाथों से ढके हुए- बुरा न बोलने का प्रतीक!

 

पर मुख्य बात है कि ये तीन बंदर मात्र प्रतीक रूप नहीं हैं। बल्कि ये मनोवैज्ञानिक व तंत्रिका सम्बन्धी व्यावहारिक पक्ष की ओर इशारा करते हैं। कैसे?

पूर्णतः जानने के लिए पढ़िए आगामी फरवरी’19 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका!

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