हर युग में बसंत पंचमी की गूँज!

बहुत बार अखण्ड ज्ञान आपके समक्ष बसंत पंचमी से जुड़े हुए आध्यात्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों को उजागर करती आई है। वसंत में संस्कृत शब्द 'वस 'का अर्थ है 'चमकना' अर्थात वसंत ऋतु प्रकृति की पूर्ण यौवन अवस्था है। ऐसा लगता है, मानो वसंतोत्सव पर प्रकृति ने रंग-बिरंगी सुन्दर ओढ़नी को धारण कर लिया हो। इस सुंदरता के साथ और भी बहुत सारी गहरी प्रेरणाएं लेकर आता है, बसंत पंचमी का पर्व! आएं, आज विभिन्न काल खण्डों के सफर को तय कर इन प्रेरणाओं को लेते हैं:-

सतयुग की बसंत बेला से सन्देश!

आज तक हमने बसंत पंचमी को विद्या, बुद्धि व ज्ञान की देवी माँ सरस्वती के आविर्भाव का मंगल दिवस जाना है। पर क्या आप इस बात से अवगत है कि यह देवी लक्ष्मी की आराधना का भी पुण्य दिवस है?

पुराणों के अनुसार बसंत पंचमी के पावन पुनीत अवसर पर ही सिंधु-सुता माँ रमा ने भगवान विष्णु को वर रूप में प्राप्त किया था। इसी दिन सम्पूर्ण सृष्टि के संरक्षक का शक्ति से, पुरुष का प्रकृति से महासंगम हुआ था। शायद यहीं कारण होगा कि आज के दिन प्रकृति अपनी पूर्ण कांति और छटा बिखेरती दिखती है।

अध्यात्म की भाषा का, सतयुग का यह मंगल मिलन लक्ष्य प्राप्ति का द्द्योतक है। हर मानव तन प्राप्त जीवात्मा के जीवन का लक्ष्य है, ईश्वर से चिर मिलन। बसंत पंचमी का पर्व हमें याद दिलाता है कि हम हर संभव प्रयास करें कि हमारे कदम ईश्वर की ओर शीघ्रता से बढ़ें।

त्रेता की बसंत बेला से सन्देश!

त्रेता युगीन भगवन राम के जीवन प्रसंग का एक महत्वपूर्ण पक्ष है- वनवास काल का वह वर्ष जब माँ सीता का हरण हो चुका था! माँ जानकी की खोज में प्रभु राम ने दक्षिण की ओर प्रस्थान किया था। वहीँ पर एक स्थान दण्डकारण्य भी था। आज यह क्षेत्र गुजरात और मध्य प्रदेश में फैला हुआ है। दंडकारण्य में उनकी यात्रा जा एक मुख्य पड़ाव था- एक भक्त की कुटिया! ...

किस भक्त की थी वह कुटिया! क्या था इसका बसंत पंचमी के पर्व से संयोग?

द्वापर और कलियुग में क्या है बसंत पंचमी के पर्व का सन्देश? पूर्णतः जानने के लिए पढ़िए आगामी फरवरी’19 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका!

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