शरणागति

शरणागति की महिमा कितनी है- इसका केवल अनुभव किया जा सकता है। जब अपने वश में कुछ रहे, हाथ-पाँव जवाब दे दें, मन अपने से ही दगा कर बैठें, बुद्धि उलझ-पुलझ कर हार जाए- तब एक ही उपाय रहता है- शरणागति। ऐसी स्थिति में अर्जुन (गीता /) ने भी यही सूत्र अपनाया था-

 

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां ...

... शाधि मां त्वां ...

  अर्थात मैं अपनी कृपण-दुर्बलता के कारण अपना कर्त्तव्य भूल गया हूँ। सारा धैर्य भी खो बैठा हूँ, अत्यंत विचलित महसूस कर रहा हूँ। ... मैं आपका शिष्य हूँ और आपकी शरणागत हूँ। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें।

शरणागति के ये भाव हर समस्या के समाधान हैं। ये हमें अपनी विवशता की ज़मीन से उठाकर असीम सामर्थ्य के आकाश तक ले जाते हैं। क्योंकि इन भावों के प्रत्युत्तर में हर युग में तारणहारों ने हमसे कहा है- 'मामेकं शरणं व्रज'- तू केवल एक मेरी शरण में जा। 'अहं त्वा ... मा शुचः'- मैं तुझे सकल पापों से मुक्त कर दूँगा। अर्जुन तू शोक मत कर, चिंता मत कर।

शरणागति का सूत्र लगते ही गुरु (या भगवान) माँ बन जाते हैं और शिष्य (या भक्त) शिशु बन जाता है। ऐसा शिशु जिसे अपनी गोद में उठाकर वह दिव्य-सत्ता चलती है। कबीर कहते हैं-'राम मेरा सुमिरन करे मैं करूँ विश्राम'- यह है एक शरणागत शिष्य की परम अवस्था ... यही नहीं, सांसारिक, सामजिक, भौतिक और मानसिक- सभी चिंताओं से निज़ात पानी हो तो एक ही महौषधि है- शरणागति।

परन्तु तहँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है- शरणागत किसके चरणों मं होना चाहिए? एक आदर्श शरण्य में क्या गुण होते हैं? ...

... दूसरा प्रश्न है, शरणागति कैसी होनी चाहिए? एक आदर्श शरणागत के क्या गुण होते हैं? ...

... देवी कयाधु हिरण्यकशिपु की भार्या और प्रह्लाद की माता थीं। वे अपने गुरु श्री नारद मुनि से कहती हैं- 'गुरुदेव मैंने आपकी शरणागति को प्राप्त किया है। कृपाकर मुझे शरणागति के दिव्य महत्त्व को समझाइए?'

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