हँसिए न! कंजूसी क्यों?

आपको अक्सर फोटो खिंचवाते हुए कहा गया होगा- 'Say Cheese!' कारण कि 'cheese' शब्द का उच्चारण आपको हँसने- मुस्कुराने में सहायता करता है। दरअसल इस शब्द में पहले दो अक्षर 'ch' दाँतों को उपयुक्त स्थिति में लाते हैं और बाद के अक्षर 'eese' होठों को उचित आकृति देते हैं। इससे चेहरे पर मुस्कुराहट खिली प्रतीत होती है।

पर वहीं आपको यह जानकर हैरानी होगी कि 17वीं सदी के दौरान यूरोप में फोटो खिंचवाने के समय अलग ट्रेंड था। तब 'Cheese' नहीं, बल्कि 'Prunes' शब्द उच्चारित करने को कहा जाता था। क्योंकि 'Prunes' के उच्चारण से होठों  का ऐसा आकार बनता है, जिससे चेहरा अत्यंत गंभीर व विचारशील दिखता है। 'ऐसा क्यों किया जाता था?' इसी प्रश्न का चिह्न आपके ललाट पर उभर आया होगा।

इसके पीछे दो कारण थे। पहला यह कि अधिकतर लोगों के दाँत अनाकर्षक होते थे, इसलिए उन्हें दिखाने से बचा जाता था। दूसरा,उस समय में हँसना-मुस्कुराना सुशिक्षित वर्ग का व्यवहार नहीं समझा जाता था। तत्कालीन मान्यता थी कि केवल गरीब और उन्मत्त लोग ही मुस्कुराते हैं। कुलीन व विशिष्ट वर्ग संगीन मुद्रा ही प्रदर्शित करते हैं।
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मुस्कुराहट का विज्ञान

खुशहाल व मनोहर परिस्थिति में हमारा मस्तिष्क अच्छा अनुभव करता है। इसी अच्छे अहसास के संकेत मस्तिष्क से चेहरे की मांसपेशियों तक पहुँचते हैं। फलस्वरूप हमारे मुख पर मुस्कुराहट खिल जाती है। यही प्रक्रिया हमारी ओर से भी घटती है। जब हम हँसते-मुस्कुराते हैं, तो उस समय मस्तिष्क तक मनोहर या खुशी भरे अनुभवों की तरंगें पहुँचती हैं। मस्तिष्क को पता लगता है कि हम अच्छा महसूस कर रहे हैं। ऐसे में मानो मस्तिष्क भी हमारी खुशी का सहभागी बन जाता है और सुखद अनुभव देने वाले तंत्रिका संचारक, जिन्हें एंडोर्फिन्स कहा जाता है, स्रावित करने लगता है। ये एंडोर्फिन्स प्राकृतिक दर्द नाशक की तरह फायदा करते हैं। ये ऐसे तनाव-हर्त्ता भी हैं, जो तनाव व चिंता को कम करने वाली अन्य दवाइयों की तुलना में बहुत बेहतर होते हैं। इनसे केवल लाभ ही लाभ होता है, कोई दुष्प्रभाव नहीं होता।

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किंतु ज़रा रूकिए। हँसने- मुस्कुराने के अनगिनत सुलाभ तो हैं। पर एक शर्त भी है।...

और तो और आपकी जानकारी के लिए यह भी बता दें कि...

मुस्कुराहट के विज्ञान को पूर्णतः जानने के लिए पढ़िए मई'19 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

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