पहले अनुभूति, फिर अभ्यास!

संत तुकाराम जी की एक प्रसिद्ध वाणी है- 'गुरुचिया मुखें होइल ब्रह्मज्ञान' अर्थात सद्गुरु ही दीक्षा देकर ब्रह्मज्ञान प्रदान करते हैं।


देखा जाए तो, यह सर्वमान्य है। भारतीयों की सामूहिक चेतना कहीं न कहीं यह मानती है कि 'गुरु बिना ज्ञान नहीं।' परन्तु प्रश्न है , य। कौन सा ज्ञान  अथवा ब्रह्मज्ञान है, जो एक पूर्ण गुरु या सच्चे मुर्शिद को पहचानने की कसौटी है? जब आप अपनी श्रद्धा का सौदा करने, अथवा अपना मस्तक झुकाने एक गुरु-सत्ता के पास जाते हैं, तो आपको उनसे किस ज्ञान-दीक्षा की अपेक्षा करनी चाहिए? यह एक महा प्रश्न है।
 

कमाल की बात है, इतिहास के सभी पूर्ण संतों या पीरों ने इस प्रश्न का उत्तर एक-जैसा दिया है। केवल शैली का अन्तर है। भाव एक समान हैं। आइए, उनके इस सनातन उत्तर को हम सिलसिलेवार ढंग से समझने का प्रयास करते हैं।...


अंतर्जगत का नूरमहल!


यह बाहरी जगत है, जिसमें हम रहते हैं। पर संतों के अनुसार हमारे मस्तक के भीतर एक सूक्ष्म 'अंतर्जगत' है। सूफी दरवेश सामी साहिब ने इसे 'नूरमहल' कहकर पुकारा है। वे कहते हैं- 'नैणानि नींहु लायो नूरमहल में नाथ सां' - मैंने बाहरी जगत से अपने नयन हटाकर नूरमहल के नाथ से प्रीत लगा ली है। कैसा है उनका यह नूरमहल?-


जिते सिजु चंडु को, को रात दीहुं।


मेहरों वसे मींहु, सामी सदा अर्श जो।।



- इस आंतरिक नूरमहल में न सूरज है, न चांद है। न दिन है, न रात है। यहाँ हर सूँ अर्श (आसमान) से मेहर की बारिश बरसती रहती है। मानो, यह ईश्वर के नूर से जगमगाता रहता है।


यही नहीं, इस नूरानी नगर की एक और अद्भुत खासियत है। वह क्या? संत चरणदास जी बताते हैं-


साधो अजब नगर अधिकाई।...


स्रवन बिना बहु बानी सुनिये, बिन जिभ्या स्वर गावैं।


बिना नैन जहँ अचरज दीखै बिना अंग लिपटावैं।।


साधो! मेरे भीतर (मस्तक में) एक अजब नगर है। इसमें बिना कानों के शब्द धुनकारें सुनती हैं। बिना जिह्वा के सुमिरन के स्वर गाए जाते हैं। बिना आँखों के अचरज भरे अपूर्व दृश्य दिखते हैं। बिना अंगों के ही ईश्वर से मन लिपट (जुड़) जाता है।


पर सामी साहिब और चरणदास जी, हम आप दोनों से पूछते हैं- 'आप ईश्वर के इस नूरमहल या अद्भुत नगर में पहुँचे कैसे?'


अन्धे वटि आयो, सुजागो स्वाभाव साँ।...


घरि पहुचाए पंहिन्जे... (सामी साहिब)


- जब मुझ अंधे के जीवन में जागा हुआ पीर आया... उसी ने हाथ पकड़ कर मुझे इस आंतरिक घर तक पहुँचा दिया।


गुरु सुकदेव करी जब किरपा, अनुभौ बुद्धि प्रकासी। (संय चरणदास जी)


जब मेरे गुरु शुकदेव ने कृपा की, तब इस अद्भुत नगर (अंतर्जगत) का अनुभव मेरी बुद्धि में प्रकाशित हुआ।


सूत्र 1- जब पूर्ण गुरु हमें ब्रह्मज्ञान की दीक्षा देते हैं, उसी समय हमारे मस्तक में आज्ञा चक्र से सहस्रार चक्र तक व्याप्त सूक्ष्म अंतर्जगत को प्रकट कर देते हैं।


दिव्य दृष्टि ही अंतर्जगत का द्वार! कैसे?…



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