बिना मार्गदर्शक कैसे करोगे मार्ग का दर्शन!

'गुरु का मिलना और अपने शिष्य को प्रेमपूर्वक देखना- उसकी जन्म-जन्मान्तरों की भूख शांत कर देता है। गुरु की दृष्टि शिष्य के लिए दूध और रोटी है।


ये मधुर वचन थे शिरडी के साईं बाबा के। एक दिन साईं अपने अनुयायियों और जिज्ञासुओं के संग विराजमान थे। तभी सहसा उनके मुख से ये वचन प्रस्फुटित हुए। तब समीप बैठे एक बुद्धिजीवी जिज्ञासु ने उनसे पूछा- 'साईं! क्या भगवान के बूते भव पार नहीं होता? ज़रूरी है क्या हम किसी गुरु की शरण लें? उस परम-सत्ता तक पहुँचने वाले इतने-इतने मार्ग हैं। कोई भी चुन लें। मंज़िल मिल जाएगी। फिर गुरु ही क्यों?'


यह प्रश्न हर गैर उपदेशी निगुरे के मन में कभी न कभी ज़रूर उठता है। इसलिए आइए जानें इसके उत्तरस्वरूप शिरडी के साईं बाबा ने क्या कहा! ... साईं ने द्वारकामाई की दीवार से टेक लगाई और आपबीती कहानी सुनाने लगे...


'... पूर्वकाल की बात है। मैं और मेरे तीन मित्र ईश्वर की खोज में निकले। ब्रह्म के मूल स्वरूप को कैसे पाया जाए- हम इस बात पर चिंतन करने लगे। इस सम्बन्ध में हम चारों की विचारधारा थोड़ी-थोड़ी अलग थी।


पहला सहयोगी कहता- ... हम अपने ही पुरषार्थ द्वारा स्वयं का उद्धार करें। जागृत और सजग रहकर आगे बढ़ें; किसी अन्य सत्ता पर निर्भर न रहें। 


दूसरा सहयोगी कहता- मनोनिग्रह करो! जिसने अपने उत्पाती मन को अधीन कर लिया, वही धन्य है। इसलिए मन की सत्ता को चुनौती दो और अपनी आत्मा को ही मार्गदर्शक मानो। किसी अन्य को नहीं!


तीसरा सहयोगी कहता- यह संसार और इसमें व्याप्त सब कुछ अपरिवर्तनीय है, अनित्य है। केवल निराकार ही सत्य है। इसलिए किसी साकार (महापुरुष) का पल्ला न पकड़ो। केवल निराकार की साधना करो।


चौथा यानि मैं कहता- भगवान ही हम सबका गुरु है। शास्त्र-ग्रंथों में उसी के आदेश और नियम हैं। उन्हीं के अनुसार हमें दृढ़ विश्वास और पूर्ण निष्ठा से आचरण करना चाहिए।


इस तरह हम चारों की धारणाएँ बहुरंगी थीं। केवल इस बात पर हम एकरंगी थे कि 'हमें साकार गुरु के चरण-शरण में माथा नहीं झुकाना।'


इसी मत को धारण कर हम स्वतंत्र रूप से निकल पड़े... ब्रह्म का शोध करने। एक घने और बीहड़ जंगल को हमने अपनी शोध स्थली चुना। बस कदम बढ़ा दिए। अभी कुछ ही फलांग चले होंगे, एक बंजारे ने हमें पुकारा। उसके चेहरे पर ओज था। उसने हमसे पूछा- 'अरे, सूर्य की गर्मी इतनी प्रखर है। आकाश अंगारे उगल रहा है। यह वन भी दुर्गम है। ऐसे में आप चारों महाशय किधर चले?'

 

हमने कहा- 'हम इस गहन वन में कुछ खोजने जा रहे हैं।'

 

बंजारा- परन्तु क्या?


हमने मुँह चिढ़ाकर कहा- 'एक गुप्त तत्त्व!... तुम्हें इससे क्या?'


बंजारा- पर बगैर मार्गदर्शक के मार्ग कैसे खोजोगे? पथ जटिल हो, तो पथ प्रदर्शक साथ ले लेना चाहिए। है कि नहीं?


उसका प्रस्ताव सुनकर हमें तो जैसे मिर्ची लग गई। हम विस्फोटक ढंग से बोल पड़े- 'हम स्वयं अपने मार्गदर्शक हैं। किसी दूसरे को (गुरु) बैसाखी बनाकर हम नहीं चलते।'


....

तो बिना मार्गदर्शक के क्या ये लोग मार्ग के दर्शन कर पाए…जानने के लिए पढ़िए जुलाई'19 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका!

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