छोटी-छोटी कहानियों में बड़ी-बड़ी बातें!

एकवर्णं यथा दुग्धं भिन्नवर्णासु धेनुषु।

तथैव धर्मवैचित्र्यं तत्त्वमेकं परं स्मृतं।।

- जिस प्रकार विविध रंग रूप की गायें एक ही रंग का (सफेद) दूध देती हैं, उसी प्रकार विविध धर्मपंथ एक ही तत्त्व की सीख देते हैं।

सज्जनो, पूर्ण महापुरुषों की चाहे भाषा-भूषा अलग हो, रंग-रूप अलग हो, जन्म-स्थान व उपदेश की शैली अलग हो- परन्तु उद्देश्य सबका एक ही रहा है- मानव कल्याण! मानव जागृति! मानव उत्थान! इसलिए चाहे पूर्व हो या पश्चिम, उत्तर हो या दक्षिण- विश्व के कोने-कोने से हर तत्त्ववेत्ता महापुरुषों के स्वरों से एक ही गूँज सुनाई देती है कि... कैसे मनुष्य आत्म-जागृति से आत्म-शांति व आत्म-उन्नति की तरफ कदम बढ़ाए? यहीं कारण है कि कहीं न कहीं इन महापुरुषों के विचार, कथाएँ व चिंतन मौलिक रूप से आपस में मेल खाते हैं। आइए, इस लेख के माध्यम से हम विश्व के दो अलग-अलग पक्षों की विचारधाराओं में मौलिक समानता को टटोलने की कोशिश करते हैं।

पहला पक्ष- ईसप की कहानियाँ  (Aesop's fables)- ईसप... प्राचीन एथेंस में जनप्रिय कहानीकार थे। ये सैंकड़ों कहानियों के रचनाकार माने जाते हैं। इन कहानियों को अंग्रेज़ी में ईसप फेबल्स के नाम से जाना जाता है। इन कथाओं के पात्र मनुष्य की अपेक्षा पशु-पक्षी अधिक हैं। ये पंचतंत्र की कथाओं के समान मनोरंजक होने के साथ-साथ नीति और व्यवहारकुशलता की शिक्षा देती हैं। यत्र-तत्र इनमें हास-परिहास का पुट भी पाया जाता है। जातक कथाओं के साथ भी इनका पर्याप्त साम्य पाया गया है। कुछ लेखक भारतीय-कथाओं को ही ईसप की कथाओं का आधार मानते हैं।

दूसरा पक्ष- संस्कृत सुभाषितानि- 'सुभाषित' शब्द 'सु' और 'भाषित' के मेल से बना है। इसका अर्थ है- सुन्दर भाषा में कहा गया। ये संस्कृत भाषा में रचित विवेकपूर्ण कहावतें, निर्देश और कहानियाँ हैं। नैतिकता और चरित्र को तैयार करने में ये सुभाषिताएँ शिक्षक के रूप में कार्य करती हैं। ये संस्कृत के सुभाषित दरअसल जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों की भंडार हैं।

इन दोनों पक्षों पर खरी उतरती छोटी-छोटी कहानियों में बड़े-बड़े संदेशों को जानने के लिए पढ़िए अगस्त'2019 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान  मासिक पत्रिका।

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