बुद्धि बढ़ी है या परिश्रम?

वर्तमान में हर क्षेत्र के अंदर प्रतिस्पर्धा की आँधी उड़ रही है। यह कर लूँ, वह करके दिखा दूँ- हर ओर बस होड़ ही होड़ है। इस होड़ में कई लोग तो अपनी कार्यशैली की उत्कृष्टता को भी दाँव पर लगा देते हैं। पर क्या काम को केवल पूरा करना ही काफी है? या फिर उसे सृजनात्मकता और बुद्धिमता के साथ सम्पन्न करना भी आवश्यक है? कुछ ऐसे ही द्वंद्व के बीच आजकल कॉर्पोरेट क्षेत्र में, बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम करने वाले लोग झूल रहे हैं। उनकी इस दुविधा को इन दो दृष्टांतों से समझने का प्रयास करते हैं-

दृष्टांत १- एक बार...  एक जंगल में खरगोश और कछुए के बीच दौड़ प्रतियोगिता आयोजित की गई। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि इस दौड़ में तेज़ भागने वाला खरगोश कछुए से पराजित हुआ। कारण? कछुए का सतत परिश्रम! जहां खरगोश मंज़िल तक पहुंचने से पूर्व ही मार्ग में विश्राम के लिए रुक गया; वहीं कछुआ  धीमी ही सही, पर निरंतर गति से अपनी मंज़िल की ओर बढ़ता रहा।


निष्कर्ष-  'सतत परिश्रम करने वाला विजित हुआ!'

दृष्टांत २-  गधा दिन-रात काम करता है। बहुत मेहनत से भार ढोता है। वहीं सिंह थोड़ा सा काम और अत्यधिक आराम करता है। पर फिर भी वह जंगल का राजा कहलाता है। क्योंकि वह थोड़ा सा कार्य भी अपनी पैनी बुद्धिमता से सम्पन्न करता है। इसका तात्पर्य कि परिश्रम करने से गधे को कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ। वह दिन-रात मेहनत करके भी जंगल का राजा नहीं बन पाया।


निष्कर्ष-  'घोर परिश्रम से बेहतर है, बुद्धिमता से कार्य करो!'

दिखने में ये दोनों ही स्थितियाँ विरोधाभासी लगती हैं। पर ये हैं नहीं! वास्तव में इन दोनों को जोड़कर ही समाधान निकलता है-  माने परिश्रम व बुद्धिमत्ता का समन्वय! क्योंकि दोनों ही मापदंड स्वयं में अधूरे हैं। अपर्याप्त हैं! केवल मेहनत से सफलता प्राप्त करना भी असंभव है। मात्र बुद्धिमता दामन पकड़े रहने से भी लक्ष्य प्राप्त नहीं होता।...

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अतः कॉर्पोरेट जगत में कार्यरत कर्मचारियों के लिए सर्वोत्कृष्ट सूत्र है- 'कार्यशैली में परिश्रम व विवेक का समन्वय!' इसे एक मैनेजमेंट मैट्रिक्स के माध्यम से भी समझा जा सकता है।

कैसे? पूर्ण रूप से जानने के लिए पढ़िए दिसंबर 2019 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

 

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