मन इतना चंचल क्यों है?

तिरुवन्नामलाई (अरुणाचल) की घाटी में श्री रमण महर्षि का आश्रम था। वहाँ बहुत से शिष्य अपने आत्म-विकास में रत थे। प्रतिदिन की भाँति महर्षि रमण प्रातः भ्रमण के लिए निकले कि अचानक उनके कदम अपने शिष्यों के साधना कक्ष और बढ़ गए। सारे शिष्य साधना की मुद्रा में अपने-अपने कुश आसन पर स्थिर होकर बैठे थे। रमण महर्षि एक माँ की भाँति काफी देर तक बड़े ही प्रेम से अपने सभी शिष्यों को निहारते रहे। एकाएक उनकी दृष्टि अपने एक शिष्य पर पड़ी, जो बहुत ही अशांत प्रतीत हो रहा था। उसकी एकाग्रता बार-बार भंग हो रही थी। कभी वह पलकें झपकाता, तो कभी झुकता, कभी हाथों को खोलता...  रमन महर्षि कुछ देर वहाँ रुके और फिर अपने कक्ष की ओर मुड़ गए।

कुछ समय बाद सभी शिष्य साधना से उठे और दैनिक कार्यों से निवृत्त होने के बाद अपने गुरुदेव से उपदेश ग्रहण करने पहुँचे। रमण महर्षि ने सभी शिष्यों पर प्रेम भरी दृष्टि डाली और अंतत उनकी दृष्टि अपने उसी शिष्य पर जाकर टिक गई, जिसे उन्होंने सुबह विचलित देखा था। उन्होंने इशारे से उसे आगे बुलाया और अपने समीप बिठा लिया। फिर उसके सिर पर अपना हाथ फेरते हुए बोले-  'क्या कारण है? तुम इतने व्यथित क्यों दिख रहे हो?

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शिष्य (रुंधे कंठ से)- भगवन्! मैं बहुत दिनों से कोशिश कर रहा था, पर हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहा था कि अपनी यह कमजोरी आपके सामने रख पाऊँ। मैं देखता हूँ कि मेरे सभी गुरु भाई एकदम शांत, स्थिर चित्त होकर साधना करते हैं। लेकिन मेरा तो साधना में ध्यान ही नहीं लगता। ऐसा क्यों भगवन्?

रमण महर्षि- इसका कारण है तुम्हारे मन की चंचलता।

शिष्य- पर मन इतना चंचल क्यों है?

शिष्य को रमण महर्षि द्वारा क्या सटीक समाधान मिला, जानने के लिए पढ़िए सितंबर 2020 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

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