भ्रष्टाचार का मंथन

कहीं हड़ताल का शोर! कहीं जुलूस का शोर! कहीं भीड़ को नियंत्रित करती पुलिस का शोर! संसद में शोर, संसद के बाहर शोर! घर की रसोई में महंगाई का शोर! विद्यालयों में छात्रों की रैगिंग का शोर! ऑफिस में आपसी रंजिश का शोर! समाज में जनता की परेशानियों का शोर! इंसानी शरीर में बीमारियों का शोर और सूक्ष्म शरीर में मानसिक रोगों का शोर! चारों तरफ शोर ही शोर!

इस स्थिति को देखकर मुझे वह चर्चित चित्र याद आता है, जिसमें पूरे समाज को एक मानव शरीर के रूप में दर्शाया गया है। उस विशाल शरीर का सिर अत्यंत छोटा व झुका हुआ है। एक तरफ का अंग काला व दूसरी तरफ का अंग सफेद रंग का है। एक हाथ कुल्हाड़ी पकड़े ऊपर उठा हुआ है और दूसरे हाथ को काटने के लिए उद्यत है।...

चित्रकार ने चित्र बिल्कुल सटीक बनाया, परंतु शायद वह इतने भयावह भविष्य की कल्पना नहीं कर सका जो वर्तमान में सत्य हो चुका है। जहाँ एक अंग ने दूसरे को काटने के लिए मात्र कुल्हाड़ी को उठाया ही नहीं, बल्कि काट ही डाला है। आज समस्या इतनी विकट हो गई है कि समाज रूपी मानव शरीर जमीन पर अपने कटे, सड़े, गले अंग टटोलने में लगा है।

इस विकट स्थिति का एक बड़ा कारण है-  भ्रष्टाचार! ...परंतु क्या... इस विकट परिस्थिति का कोई हल नहीं? कई विचारक तो इतने हताश हो चुके हैं कि उनके अनुसार अब एक ही समाधान शेष है, प्रलय! सब समाप्त हो जाए! फिर 'डार्विनवाद की थ्योरी' के अनुसार श्रेष्ठ गुणों से युक्त जीवन नव सृष्टि में ही प्रकट होगा।

परंतु क्या यह विचार, यह सोच सही है?... जानने के लिए पढ़िए सितंबर 2020 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका। 

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