दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के समग्र शिक्षा उपक्रम मंथन सम्पूर्ण विकास केन्द्र (SVK) की मासिक मूल्य-आधारित कार्यशाला श्रृंखला संस्कारशाला 4 से 12 वर्ष के बच्चों के लिए एक विशिष्ट मंच है। यह कार्यशाला बालकों में सनातन संस्कारों, भावनात्मक दृढ़ता तथा अनुभव-आधारित शिक्षा के माध्यम से संतुलित व्यक्तित्व निर्माण का लक्ष्य साधती है।

इस माह आयोजित धी संस्कारशाला – सप्त धर्म लक्षणम् ने बच्चों के भीतर आत्मबल, नैतिक सूझ-बूझ और जीवनोपयोगी कौशलों का सुन्दर विकास किया। इस वर्ष की वार्षिक विषय ‘धर्म के दस लक्षण’ पर आधारित संस्कारशाला में प्रत्येक माह एक लक्षण पर केन्द्रित कार्यशाला संचालित की जाती है। इस बार का विषय था सातवाँ धर्म-लक्षण — ‘धी’, जिसका अर्थ है सत्कर्मों द्वारा बुद्धि का परिष्कार और विवेक का आलोक।
अक्टूबर 2025 में देशभर की विभिन्न शाखाओं, विद्यालयों तथा NRI बच्चों सहित लगभग 2180 बच्चों ने कुल 50 संस्कारशाला कार्यशालाओं के माध्यम से इसका लाभ प्राप्त किया।

संस्कारशालाओं का प्रादेशिक विस्तार
1. बिहार
- प्राथमिक विद्यालय, भिलवाड़ा (दरभंगा)
- तक्षिला पब्लिक स्कूल, औरई (मुज़फ्फरपुर)
- मध्य विद्यालय, रटवारा (मुज़फ्फरपुर)
- सेंट टेरेसा इंटरनेशनल स्कूल, बिहटा (पटना)
- मध्य विद्यालय, उसरी (पटना)
- ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल स्कूल, मधेपुरा
2. मध्य प्रदेश
- एश्वर्या कंप्यूटर इन्फर्मेशन एंड टेक्नोलॉजी इंस्टिट्यूट, बालाघाट
3. उत्तर प्रदेश
- प्राथमिक विद्यालय, पीलीभीत
- प्राथमिक विद्यालय, फरीदपुर (बरेली)
- सनलाइट पब्लिक स्कूल, शाहजहाँपुर
- उच्च प्राथमिक विद्यालय, दियोरिया कला ब्लॉक—बिलसंडा (पीलीभीत)
- प्राथमिक विद्यालय, मानपुर (बरेली)
इस माह की धी संस्कारशाला– सप्त धर्म लक्षणम् मंथन का मूलाधार रही। कार्यकर्ताओं द्वारा संचालित संवादात्मक, चिंतनपरक और अनुभव-आधारित सत्रों ने बच्चों में उचित सोचना, सही चुनना और धर्मानुकूल आचरण करना सहज रूप से विकसित किया।
सातवें धर्म-लक्षण पर आधारित प्रत्येक गतिविधि—कथा, चर्चा, मनन और अभ्यास—बच्चों को यह समझाने हेतु रची गई कि ‘धी’ मात्र बुद्धि नहीं, अपितु विवेक से परिष्कृत, मूल्य-संस्कारों से सम्पन्न बुद्धि है।
सत्रों का आरम्भ सही और गलत के भेद पर सार्थक संवादों से हुआ, जिनमें सरल कहानियों और दैनिक जीवन के उदाहरणों ने बच्चों को नैतिक निर्णयों की स्पष्टता प्रदान की। इसके पश्चात् श्लोक-अध्ययन सत्र ने प्राचीन वाङ्मय को व्यवहारिक जीवन से जोड़ते हुए धर्ममूल्यों को अंतर्मन में उतारने के लिए प्रेरित किया।
निर्णय-क्षमता प्रशिक्षण ने उन्हें भावनाओं का संयम, अनावश्यक विचारों से दूरी, तथा समूह दबाव या असफलता-भय के बीच भी स्थिर रहने की कला सिखाई। एक रोचक क्विज़ प्रतियोगिता ने उनके चिंतन को परखा, वहीं बटरफ्लाई इफ़ेक्ट गतिविधि ने यह बताया कि छोटा-सा सद्कार्य भी जीवन में विशाल और शुभ परिवर्तन की तरंगें उत्पन्न कर सकता है।
शांति मंत्र के उच्चारण के साथ सत्रों का समापन हुआ, तथा सभी ने दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के पावन चरणों में कृतज्ञता अर्पित की—जिनकी अनुकम्पा से सप्त धर्म लक्षणम् साधारण पाठ नहीं, अपितु एक जीवंत अनुभूति बनकर बच्चों के अंतर्मन में जाग्रत हुआ।
