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दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान (डीजेजेएस) द्वारा 4 से 10 जनवरी 2026 तक, कर्नाटक के बेंगलुरु क्षेत्र में आध्यात्मिक सात दिवसीए श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया गया। इन सात दिनों तक, पूरे क्षेत्र से श्रद्धालु, साधक और स्थानीय निवासी एकत्रित हुए और भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं एवं उपदेशों का आनंद लिया। इस कथा का उद्देश्य केवल श्रीकृष्ण की प्रेरणादायक कथाओं का श्रवण कराना ही नहीं, बल्कि लोगों को नैतिक मूल्यों, आंतरिक शक्ति और भक्ति से युक्त जीवन जीने की ओर अग्रसर करना भी रहा।

Shri Krishna Katha spreads Divine Wisdom in Bengaluru, Karnataka

भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षाओं के माध्यम से डीजेजेएस ने समाज में धर्मनिष्ठा, करुणा और आत्मबोध की भावना जागृत करने का संकल्प लिया, जिससे एक अधिक सजग और समरस विश्व का निर्माण हो सके।

कथा का मधुर वाचन दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी आस्था भारती जी द्वारा किया गया। अपने ओजस्वी प्रवचनों में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता, महाभारत और भागवतम आदि वेद पुराणों में श्रीकृष्ण के विषय में वर्णित गूढ़ ज्ञान को सरल भाषा में समझाया। उन्होंने श्रीकृष्ण को केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि शाश्वत पथप्रदर्शक, धर्म के संस्थापक और दिव्य नीति के प्रवर्तक के रूप में चित्रित किया, जिनका जीवन और उपदेश आज भी मानवता को प्रेरित करते हैं। साध्वी जी ने विशेष रूप से बताया कि वृंदावन की बाल लीलाएँ प्रेम और आनन्द का प्रतीक हैं, जबकि महाभारत में उनकी भूमिका धर्म और सत्य के परम मार्गदर्शन का प्रतीक है। श्रीकृष्ण के उपदेश विशेषतः गीता के उपदेश आज भी साहस, वैराग्य और फल की इच्छा रहित हो निष्काम भाव से कर्म करने की अमर शिक्षा देते हैं।

Shri Krishna Katha spreads Divine Wisdom in Bengaluru, Karnataka

साध्वी जी ने श्रीकृष्ण के उपदेशों के मर्म को ब्रह्मज्ञान के व्यवहारिक अनुभव से जोड़ा| ब्रह्मज्ञान वह शाश्वत ज्ञान है जो मनुष्य के भीतर छुपे हुए दिव्यत्व का दर्शन कराता है। केवल शास्त्र पढ़ना या कथाएँ सुनना पर्याप्त नहीं है; सच्चा संबंध तभी प्रारंभ होता है जब कोई पूर्ण सतगुरु ब्रह्मज्ञान प्रदान करके अंतःचक्षु को खोलता है। इस अनुभव के द्वारा साधक आत्मप्रकाश का ध्यान करना सीखता है, जो जीवन में शांति, स्पष्टता और उद्देश्य प्रदान करता है। उन्होंने सभी को स्मरण कराया कि आत्मज्ञान ही श्रीकृष्ण के संदेश का मूल है और भक्ति को भी उसका सच्चा अर्थ तब ही मिलता है जब वह प्रत्यक्ष आंतरिक अनुभव से जुड़ती है। ध्यान, भक्ति और सतगुरु की कृपा से साधक श्रीकृष्ण के उपदेशों को अपने जीवन में जीना प्रारंभ करता है और भीतर से धीरे–धीरे रूपांतरित होता है।

इस श्रीकृष्ण कथा में समाज के विभिन्न क्षेत्रों से आए माननीय अतिथियों, गणमान्य नेताओं और अधिकारियों ने भी अपनी उपस्थिति से गरिमा बढ़ाई। उनकी उपस्थिति ने आयोजन को और भी स्मरणीय बना दिया और प्रोत्साहन प्रदान किया। कथा का आध्यात्मिक वातावरण और दिव्य ज्ञान का संदेश मीडिया द्वारा भी व्यापक रूप से प्रकाशित हुआ। अनेक श्रद्धालुओं ने अपना अनुभव साँझा करते हुए बताया कि कथा ने उनके हृदय को गहराई से छुआ और उन्हें अपने जीवन में आत्मिक परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। बेंगलुरु में सात दिवसीय श्रीकृष्ण कथा केवल दिव्य लीलाओं का उत्सव नहीं रही, बल्कि श्रीकृष्ण की सनातन शिक्षाओं और ब्रह्मज्ञान की ज्योति से आलोकित होकर हर व्यक्ति के लिए अपने आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने का आह्वान बनी।

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