दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान (डीजेजेएस) की सुनाम शाखा द्वारा दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी (संस्थापक एवं संचालक, डीजेजेएस) के दिव्य मार्गदर्शन में 5 से 11 दिसम्बर 2025 तक संगरूर, पंजाब में सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया। इस पुण्य अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित हुए, जिन्होंने अपार श्रद्धा के साथ श्रीकृष्ण की दिव्य महिमा में डुबकी लगाई और शाश्वत ज्ञान का आशीष प्राप्त किया।

गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी वैष्णवी भारती जी ने बड़ी ही सुंदरता एवं भावपूर्ण ढंग से श्रीमद् भागवत पुराण में निहित आध्यात्मिक निधियों का रहस्योद्घाटन किया। उन्होंने समझाया कि श्रीमद् भागवत पुराण केवल भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन भर नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा आध्यात्मिक प्रकाशपुंज है जो आंतरिक भक्ति को जागृत करता है और आत्मा व परमात्मा के बीच जीवंत संबंध स्थापित करता है। इसके दिव्य स्पंदनों को अपने अंतःकरण में उतारकर साधक हृदय की शुद्धि, मन की उन्नति और भक्ति-पथ पर स्थिरता से बढ़ने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं।
साध्वी जी ने महाभारत के गूढ़ भाव को स्पष्ट करते हुए कहा कि कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर मानव के भीतर आज भी जारी है। पाप और अधर्म से ग्रस्त समाज में अपराध, नैतिक पतन और नकारात्मक प्रवृत्तियों का बढ़ना इस संघर्ष को और तीव्र कर रहा है। हम सबके भीतर आत्मा पांडवों के रूप में विद्यमान है, जबकि असंयमित इच्छाएं कौरवों के रूप में प्रकट होती हैं। यह निरंतर आंतरिक संघर्ष केवल श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन से ही हल हो सकता है, जो अज्ञानता का अंधकार दूर करने वाले एवं ब्रह्मज्ञान के विज्ञान के माध्यम से आत्मा को सद्गुणों में दृढ़ बनाकर, अवगुणों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करते हैं।

उन्होंने आगे बताया कि धर्मग्रंथ भी उद्घोष करते हैं कि केवल समय के पूर्ण गुरु ही साधकों को ब्रह्मज्ञान प्रदान कर सकते हैं। यही वह दिव्य ज्ञान है, जिसके द्वारा साधक परमात्मा का ध्यान कर जीवन के वास्तविक उद्देश्य को जान सकता है। वर्तमान युग में, जब मानवता भौतिकवाद और व्यग्रता के बीच संतुलन खो रही है, तब आध्यात्मिक जागरण और भी आवश्यक हो जाता है। केवल यही जागरण शांति, सामंजस्य और करुणा को लौटा सकता है, एवं मानवजाति को प्रभु की "सृष्टि के सिरमौर" बनने की वास्तविक परिकल्पना तक पहुंचा सकता है।
प्रवचन में स्पष्ट किया गया कि भक्ति वृद्धावस्था तक टालने योग्य साधना नहीं है, बल्कि यह जीवन का मूल सार है। यह स्पष्टता, संवेदनशीलता और समता को पोषित करती है, जिससे व्यक्ति सांसारिक दायित्वों और आध्यात्मिक विकास में संतुलन स्थापित कर सकता है। श्री आशुतोष महाराज जी, इस युग के पूर्ण आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में, ब्रह्मज्ञान प्रदान कर असंख्य साधकों के जीवन को आलोकित कर चुके हैं, और उन्हें सच्ची भक्ति के परिवर्तनकारी मार्ग पर अग्रसर कर रहे हैं।
सप्ताह भर चली यह कथा अंत में एक प्रबल आध्यात्मिक आह्वान के साथ संपन्न हुई। साध्वी जी ने सभी साधकों को जीवन के उच्च उद्देश्य को अपनाने, भक्ति मार्ग पर दृढ़ता से चलने और अपने भीतर धर्म की विजय सुनिश्चित करने का संदेश दिया, जिससे श्रीकृष्ण का दिव्य उपदेश जीवन्त हो उठे।