वर्तमान में आधुनिकता और भौतिकवादी सभ्यता की लहर ने तकनीकी प्रगति के आकर्षण में व्यक्ति पर इतना अधिक प्रभाव डाला है कि वह प्रतिदिन तेजी से बिमारियों की ओर बढ़ता जा रहा है। यह प्रवृति महामारी की तरह व्यापक रूप में मानवीय विचारों को प्रभावित कर रही है। इसी कारण आज शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होना महत्वपूर्ण हो गया है।

आध्यात्मिक ज्ञान के रूप में मानसिक शांति प्राप्त करने हेतु वैदिक युगीन ज्ञान व पद्धति को प्रदान करने के लिए दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान ने इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में 16 सितंबर से 22 सितंबर, 2018 तक सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा आयोजित की।
सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या कथाव्यास साध्वी भाग्यश्री भारती जी ने बताया कि भगवान कृष्ण समाज में आध्यात्मिकता को स्थापित करने हेतु अवतरित हुए थे। उन्होंने संसार में धर्मराज्य स्थापित किया। उन्होंने क्षत्रियों के भीतर अहंकार विहीन वीरता की सच्ची भावना को जागृत कर ईश्वरीय सत्ता के प्रति समर्पित और सक्रिय साधन का रूप प्रदान किया। श्री कृष्ण योगेश्वर व शुद्ध प्रेमावतार थे। उनके जीवन की प्रत्येक दिव्य लीला समाज का मार्गदर्शन कर उत्कृष्टता और आध्यात्मिकता के मार्ग तक ले जाने वाली है।

कथाव्यास जी ने समझाया कि मात्र भौतिकवादी समृद्धि द्वारा आत्मनिर्भरता प्राप्त नहीं की जा सकती है। मानव को ईश्वरीय स्रोत व दिव्य चेतना से जुड़ना होगा। निस्संदेह भगवान सर्वत्र है लेकिन उनकी प्राप्ति मात्र भीतर की चेतना के जागरण द्वारा ही सम्भव है। शास्त्रों में कहा गया है कि 'अगर मानव पूरी दुनिया प्राप्त करले पर अपनी आत्मा खो दे, तो उसे क्या लाभ होगा।' यही कारण है कि आत्मा का धन ही एकमात्र सच्चा धन है। ईश्वर प्राप्ति द्वारा ही आत्मा वास्तविक सुख व मानसिक शांति को प्राप्त कर पाती है।
इस दिव्य शांति प्राप्ति हेतु एक अनिवार्य आवश्यकता है- दिव्य नेत्र! केवल दिव्य नेत्र द्वारा ही ध्यान केंद्रित करने की क्षमता प्राप्त होती है। मानवीय चर्म चक्षु केवल भौतिक संसार तक सीमित हैं। एक पूर्ण सतगुरु द्वारा ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति कर आत्म-साक्षात्कार व ईश्वर दर्शन किया जा सकता है। कथा द्वारा लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान का संदेश प्राप्त हुआ।